लड़की उपेक्षित क्यों

क्या हुआ?

 “लड़की हुई है। अरे! यह तो बुरा हुआ।” अकसर जब लड़की का जन्म होता है तो सब घरवाले यही बात करते हैं। लेकिन वह यह नहीं जानता कि आज लड़की हर काम में लड़कों से आग लगा रही है। पहले जमाना था कि लड़की को घर पर कैदी की तरह रखा था लेकिन अब आज की युवा पीढ़ी जाग उठे है। आज का विज्ञान क्षेत्र में लड़की का बहुत योगदान है ा

परिवार या पूर्ण का पूरा समाज लड़कियों को ही सीमेट दया दया क्यों दिखाना चाहता है जब कि लड़कों को नहीं? घरवालों का खानदान का नाम रोशन करने के लिए लड़के का हाथ माना जाता है, तो कुल की कमान नष्ट करने के नाम पर सिर्फ लड़की को ही क्यों जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? शादी से पहले लड़की अपने माँ-बाप, भाई-बहन के नियंत्रण में रहती हैं शादी के बाद पति और सास-ससुरु और ननद-देवर इत्यादी की बूढ़ापें में पुत्रों और बहनों के बीच में पढ़ता है, ऐसा क्यों? यह ठीक है कि हमारे संस्कार में यह कहते हैं कि लड़की को मौत की सीमाओं का पालन करना चाहिए पर एक सीमा तक। इतना नहीं कि उनकी व्यक्तित्व दब जाए। क्या यह सब नारी जाति के लिए ठीक रहेगा? 

लड़की यदि तरक्की या अगाग बढ़ती अवसर चाहती है तो उसे मना किया जाता है क्या लड़की कों सिर्फ एक कैदी की ही ज़िन्दगी जीने का हक है घर में सभी माता पिता घर के अधिकांश कामों में बेटे से सलाह मशविरा करना है लेकिन बेटी को पराजय समझकर उनकी अवहेलना करना क्या बेटी होना पाप है यदि बेटी की गलती होती है तो भी माँ-बाप या घर के अन्य सदस्य ताने मार मार और सचेत करते हैं। उसको दुखों का कोई सीमा नहीं रहती है उसे उसका स्थान दें अपनापन के लिए तरसती बेटी को आपका प्यार उसे जीना सिखालाएगा ा

 आखिर बेटी यानी नारी को इतनी कथित क्यों समझा जाता है बेटी घर और समाज का एक साथ है आज बेटा घर का चिराग हो तो बेटी भी किसी घर की रोशनी है हर क्षेत्र मे नारी पुरुष के साथ कंधा मिलाकर चल रहा है, लेकिन आज भी परंपराओं से जुड़े लोग बेटी को मनहूस कहते हैं और मानते हैं। वैसें तो के रूप देवी दुर्गा का भी है। जो यहीं अपने पर आ जाए तो हाथ मे खपपर लेकर काली भी बन जाता है। आज माँ बाप की जिम्मेदारी बेटों की बजाय बेटियां अच्छी तरह उठाती है जब घर में बेटे का जन्म हुआ तो सभी लोग पूले नहीं समाते और जब लड़की का जन्म होता है तो उनके मुंह से आह निकलें जाते हैं। आखिर क्यों? आइये इस विचारधारा को बदलने के लिए!

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